विचार | संवाद | लोग | एक बेहतर भारत

लोकमंथन

लोकचेतना से विश्व कल्याण की ओर....

लोकमंथन दूरदर्शी विचारकों, विद्वानों, साधकों और कर्मशील लोगों को भारत के सभ्यतागत मूल्यों, ज्ञान परंपराओं और भारत के भविष्य पर सार्थक संवाद में जोड़ने वाला मंच है।
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“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
यह मेरा है, वह पराया है—ऐसी गणना छोटे मन वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों के लिए तो पूरी धरती ही एक परिवार है।
— महाउपनिषद् (6.71)

सभ्यतागत संवाद

ज्ञान परंपराएँ

सांस्कृतिक विरासत

जन सहभागिता

विश्व कल्याण

भारत
केवल एक राष्ट्र ही नहीं, अपितु एक सतत् चिरंतन सभ्यता है

विश्व के अधिकांश आधुनिक राष्ट्र पिछले कुछ शताब्दियों में बने हैं; भारत की पहचान इससे कहीं प्राचीन है। भारत केवल राजनीतिक सीमाओं से निर्मित राज्य नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों से प्रवाहित एक जीवंत सभ्यता है। इस सभ्यता की शक्ति उसकी राजधानियों में नहीं, बल्कि उसके समाज में रही है।

लोकमंथन: भारतीय सभ्यता के संवाद का समकालीन मंच

लोकमंथन किसी सम्मेलन का नाम नहीं है; यह भारत की संवाद-परंपरा का आधुनिक पुनर्प्रतिष्ठापन है। जब वर्ष 2016 में भारत की हृदयस्थली भोपाल में प्रथम लोकमंथन का आयोजन हुआ, तब उसके केंद्रीय विषय "औपनिवेशिकता से भारतीय मानस की मुक्ति" ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया—क्या राजनीतिक स्वतंत्रता के पश्चात भी हमारा ज्ञान, इतिहास, शिक्षा और बौद्धिक विमर्श औपनिवेशिक दृष्टि से मुक्त हो पाया है?
इस प्रश्न ने भारतीय बौद्धिक जगत में एक नई ऊर्जा का संचार किया। लोकमंथन ने यह स्थापित किया कि भारत का भविष्य केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि वैचारिक स्वराज, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और ज्ञान-परंपरा के पुनर्जागरण से निर्मित होगा।

लोकमंथन
‘राष्ट्र सर्वोपरि’ विचारकों एवं कर्मशीलों का राष्ट्रीय विमर्श
Colloquium of ‘Nation First’ Thinkers and Practitioners

लोक
विचार
मंथन
राष्ट्र की आत्मा

भारतीय लोकचेतना

भारत की शक्ति उसके लोगों में है — उनकी सामूहिक स्मृति, मूल्यों, जीवन के अनुभवों और शाश्वत ज्ञान में। यही जीवंत चेतना, अर्थात लोकचेतना, राष्ट्र की आत्मा है।
वटवृक्ष के नीचे सभ्यतागत संवाद

‘लोक’

भारतीय चिंतन में ‘लोक’ का अर्थ केवल ‘भीड़’ या ‘जनसमूह’ नहीं है। लोक वह है जिसमें समाज का अनुभव, नैतिकता, संस्कृति, स्मृति, आस्था, आचरण और ज्ञान एक साथ प्रवाहित होते हैं।
भारतीय परंपरा में शास्त्र और लोक (सामाजिक प्रज्ञा तथा सामूहिक चेतना) परस्पर विरोधी नहीं हैं।
“शास्त्र दिशा देता है;
 लोक उसे जीवन देता है।”

“मंथन”

भारतीय सभ्यता ने कभी एकरूपता नहीं थोपी। उसने संवाद किया, प्रश्न पूछे, मतभेदों को स्थान दिया और सत्य की खोज को सामूहिक प्रक्रिया बनाया। इसलिए भारतीय संस्कृति में ‘मंथन’ केवल चर्चा नहीं है।
इसका अर्थ है:
  • विविध अनुभवों का संगम।
  • तर्क और परंपरा के बीच संवाद।
  • मतभेद से उभरता समन्वय।
  • और अंततः, जनकल्याण (लोकमंगल) की ओर उन्मुख समाधान।
इस परंपरा का आधुनिक, संस्थागत और समकालीन रूप लोकमंथन है।

अब तक की यात्रा

2016 से लोकमंथन ने भारत भर में यात्रा की है। प्रत्येक संस्करण ने पिछली यात्रा को आगे बढ़ाया—बौद्धिक स्वराज से सभ्यतागत चेतना तक और ज्ञान से आचरण तक।
लोकमंथन 2024 – भाग्यनगर
2024 भाग्यनगर (हैदराबाद)
विषय

लोकावलोकन

विचार, व्यवहार और व्यवस्था : विचार को समाज, शासन और जीवन के व्यवहार में रूपांतरित करने का संकल्प।

संस्मरण देखें
लोकमंथन 2022 – गुवाहाटी
2022 गुवाहाटी
विषय

भारत की लोक परंपराएँ

लोक परंपराओं के माध्यम से लोकजीवन को भारतीय ज्ञान का जीवंत स्रोत स्वीकार करने का आह्वान।

संस्मरण देखें
लोकमंथन 2018 – राँची
2018 राँची
विषय

भारत बोध

जन गण मन : भारत को उसकी सभ्यतागत चेतना से पुनः परिचित कराने का प्रयास।

संस्मरण देखें
लोकमंथन 2016 – भोपाल
2016 भोपाल
विषय

औपनिवेशिकता से भारतीय मानस की मुक्ति

बौद्धिक स्वराज का उद्घोष।

संस्मरण देखें

लोकमंथन-2026 : क्यों और किसलिए ?

आज आवश्यकता केवल इस बात की नहीं कि भारत अपने अतीत का स्मरण करे; आवश्यकता इस बात की है कि वह अपने अनुभवों को भविष्य की दिशा में रूपांतरित करे । लोकमंथन-2026 का उद्देश्य अतीत का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि अतीत से प्रेरणा लेकर भविष्य का निर्माण करना है। 
यह मंच ऐसे प्रश्नों पर मंथन करेगा- 
  •  क्या भारतीय परिवार व्यवस्था आधुनिक समाज के लिए कोई वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत कर सकती है ? 
  • क्या भारतीय जल, वन और कृषि परंपराएँ वैश्विक जलवायु संकट के समाधान दे सकती हैं ? क्या योग, आयुर्वेद और समग्र स्वास्थ्य-दृष्टि मानसिक स्वास्थ्य संकट का उत्तर बन सकती है ? 
  • क्या भारतीय ज्ञान मीमांसा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नैतिक विमर्श को दिशा दे सकती है ?
  • क्या लोकजीवन में निहित सहअस्तित्व की संस्कृति वैश्विक सामाजिक ध्रुवीकरण और सभ्यतामूलक तनावों तथा युद्ध में शांति का समाधान प्रस्तुत कर सकती है ? इन प्रश्नों के उत्तर केवल अकादमिक विमर्श से नहीं मिलेंगे; इनके लिए लोक, शास्त्र, नीति, विज्ञान और व्यवहार-सभी का समन्वित संवाद आवश्यक है । और यही लोकमंथन-2026 का मूल उद्देश्य है।
2026 की थीम देखें →

व्यक्ति से ऊपर समाज

अधिकारों से ऊपर कर्तव्य

प्रतिस्पर्धा से ऊपर सहयोग

उपभोग से ऊपर लोककल्याण

विश्व कल्याण की ओर

भारत